The Dirty Secrets of Zero Commission Business I Meesho vs Flipkart vs Amazon I Business case study.

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Vídeo em Hindi, publicado pelo canal Readers Book 2M.

इस सामग्री के बारे में: नीचे दिया गया सारांश, मुख्य बिंदु और विषय वीडियो की ट्रांसक्रिप्ट से स्वचालित रूप से तैयार किए गए हैं। वे वीडियो में प्रस्तुत सामग्री, राय, दावों और भविष्यवाणियों को दर्शाते हैं और All The Gate की ओर से किसी समर्थन, सत्यापन या तथ्य-जांच का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं।

वीडियो सारांश

यह वीडियो ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म Meesho के बिजनेस मॉडल की पड़ताल करता है, यह समझाते हुए कि 0% कमीशन पर सामान बेचने के बावजूद कंपनी विज्ञापन, लॉजिस्टिक्स और अन्य शुल्कों के माध्यम से कैसे लाभ कमाती है।

मुख्य बिंदु

  • Meesho ने पारंपरिक ई-कॉमर्स मॉडल को चुनौती देते हुए सेलर्स के लिए 0% कमीशन की नीति अपनाई।
  • कंपनी का प्रारंभिक मॉडल सोशल कॉमर्स पर आधारित था, जिसमें महिलाएं व्हाट्सएप के जरिए सामान बेचती थीं।
  • जीरो कमीशन के कारण बड़ी संख्या में छोटे दुकानदार और बजट-संवेदनशील ग्राहक प्लेटफॉर्म से जुड़े।
  • प्लेटफॉर्म विजिबिलिटी बढ़ाने के लिए विज्ञापन (एड्स) और कॉस्ट-पर-क्लिक के माध्यम से कमाई करता है।
  • थर्ड-पार्टी कूरियर कंपनियों के साथ बड़े पैमाने पर वॉल्यूम डील के जरिए लॉजिस्टिक्स और शिपिंग से भी आय होती है।

विषय

ई-कॉमर्सजीरो कमीशन मॉडलडिजिटल मार्केटिंगलॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेनसोशल कॉमर्सबिजनेस मॉडल
वीडियो का ट्रांसक्रिप्ट

उपलब्ध कैप्शन का पाठ; इसमें त्रुटियाँ हो सकती हैं।

₹500 का सामान बेचिए Amazon या Flipkart पर। आपके हाथ में आएंगे लगभग 380 से 400। बाकी का पैसा प्लेटफार्म का। हर आर्डर पर बिना कुछ किए इसी को कमीशन कहते हैं और यही इन कंपनियों की कमाई का सबसे बड़ा इंजन है। साल में लाखों सेलर्स, करोड़ों ऑर्डर्स हर ऑर्डर पर एक छोटा सा हिस्सा काटा जाता है और वो छोटा हिस्सा जोड़कर अरबों डॉलर की कंपनी बन जाता है। अब सोचिए कोई कंपनी आए और कहे मैं एक रुपया नहीं लूंगी। बेचिए जितना चाहे पूरा पैसा आपका। पहली नजर में लगेगा यह कोई चैरिटी है या कोई सस्ती मार्केटिंग ट्रिक जो दो-ती महीने चलकर खत्म हो जाएगी। लेकिन असली खेल कहीं और है। और वो खेल इतनी चालाकी से खेला गया कि मार्केट की दो सबसे बड़ी कंपनियों की नींद उड़ गई। एक ऐसी कंपनी जिसके पास ना अपनी गाड़ियां हैं, ना अपने बड़े वेयर हाउस फिर भी आज करोड़ों ऑर्डर्स रोज उसके प्लेटफार्म से गुजरते हैं। तो आखिर यह मुफ्त का खेल कैसे चलता है? आज हम समझेंगे कि 0% कमीशन के पीछे पैसा बनता कहां है। छोटे दुकानदार इसमें कहां खड़े हैं और यह फार्मूला आपकी अपनी जिंदगी में कैसे काम करता है? भाई देखो जब आप किसी बड़े प्लेटफार्म पर सामान बेचते हैं तो हर बिक्री का एक हिस्सा उस प्लेटफार्म को जाता है। 5% से 20% तक कैटेगरी के हिसाब से कपड़ों पर अलग रेट, इलेक्ट्रॉनिक्स पर अलग, ब्यूटी प्रोडक्ट पर अलग, ऊपर से शिपिंग चार्ज, पैकिंग चार्ज, पेमेंट प्रोसेसिंग [संगीत] फी और कभी-कभी हर महीने का सब्सक्रिप्शन भी। मान लीजिए इंदौर का एक छोटा कारोबारी बच्चों की टीशर्ट [संगीत] बनाता है। उसकी लागत है ₹200। कपड़ा, सिलाई, धागा, मजदूरी सब मिलाकर और वह चाहता है कि हर टीशर्ट पर उसके बचे ₹60 ताकि उसका घर चल सके। लेकिन अब हिसाब लगाइए 18% कमीशन, फिर शिपिंग, फिर पैकिंग, फिर पेमेंट फी सब जोड़कर वही टीशर्ट उसे ₹420 में लिस्ट करनी पड़ती है। यानी जो चीज ₹260 में भी बिक सकती थी, वह ₹420 पर पहुंच जाती है। अब देखिए असली खेल क्या हुआ। कमीशन सिर्फ दुकानदार का मुनाफा नहीं काटता। यह पूरी कीमत को ऊपर धकेल देता है। और वह बढ़ी हुई कीमत आखिर में कौन भरता है? ग्राहक। यानी यह बोझ सबसे आखिर में उस आम आदमी की जेब पर गिरता है जो ऑनलाइन सामान मंगाता है। यहीं पर एंट्री होती है एक नए खिलाड़ी की जिसने ठीक इसी बोझ को हटाकर अपनी पूरी दुनिया खड़ी कर ली। नाम है Meesho। इसने आकर छोटे दुकानदारों से कहा हमारे प्लेटफार्म पर बेचिए कमीशन शून्य। यानी टीशर्ट ₹260 की बिकी तो ₹260 आपके ना कोई कंठ ना कोई हिस्सा। अब सवाल यह है कि जो कंपनी बिक्री का हिस्सा नहीं मांगती वो करोड़ों के सर्वर्स, हजारों सैलरीज, महंगी मार्केटिंग और रोज के लाखों शिपमेंट्स का खर्च उठाती कैसे है? इतना ही नहीं आज यह कंपनी अरबों डॉलर की वैल्यू्यूएशन पर खड़ी है। यानी इन्वेस्टर्स ने इसमें हजारों करोड़ लगाए हैं। क्या यह कोई भलाई का काम है? क्या यह कोई सोशल सर्विस है जो देश के गरीब दुकानदारों की मदद के लिए चलाई जा रही है? बिल्कुल नहीं। सच यह है कि यह ई-कॉमर्स के सबसे चतुर बिजनेस मॉडल्स में से एक है। एक ऐसा मॉडल जिसमें पैसा कमाया जाता है। बस कमाने की जगह इतनी समझदारी से चुनी गई है कि ग्राहक और दुकानदार दोनों को लगता है कि उनका फायदा हो रहा है। और इस मॉडल को सच में समझने के लिए हमें कंपनी की शुरुआत तक जाना पड़ेगा। जहां कुछ भी योजना के मुताबिक नहीं हुआ था। साल 2015 आईआईटी दिल्ली से निकले दो दोस्त विदित आत्रे मेरठ के रहने वाले और संजीव बरनवाल झारखंड के लेकर आए एक ऐप जिसका नाम था फैशनियर आईडिया बड़ा सीधा था लोग अपने आसपास की दुकानों से सामान ऑनलाइन ऑर्डर करें और वो सामान उनके घर तक पहुंचे यानी लोकल शॉपिंग का डिजिटल वर्जन कागज पर सब बढ़िया लग रहा था मार्केट बड़ा था प्रॉब्लम असली थी और टीम पढ़ी लिखी थी लेकिन जमीन पर कुछ नहीं चला चला। दुकानदारों को ऑनलाइन बेचने में कोई दिलचस्पी नहीं थी। ना तो ऐप उन्हें समझ आती थी, ना इस बात का भरोसा था कि पैसा सही समय पर मिलेगा और ना ही उनके पास इतना वक्त था कि वह रोज नए-नए ऑर्डर संभाल सके। नतीजा यह आईडिया बुरी तरह फेल हो गया। लेकिन फेलियर की खासियत यह है कि वो आपको वो चीज दिखा जाता है जो सक्सेस कभी नहीं दिखाती। इसी फेल के बीच इन दोनों की नजर एक क्वायर्ड ट्रेंड पर पड़ी। एक ऐसा ट्रेंड [संगीत] जो शहरों की हेडलाइंस में कभी नहीं आता था। लेकिन छोटे कस्बों में धीरे-धीरे तेजी से फैल रहा था। और वो ट्रेंड देखकर उन्होंने वो ढूंढ लिया जो करोड़ों लोगों की जिंदगी बदलने वाला था। छोटे शहरों और कस्बों में लाखों महिलाएं ज्यादातर घर संभालने वाली चुपचाप एक छोटा बिजनेस चला रही थी। तरीका बड़ा सीधा था। होलसेल मार्केट से सस्ते कपड़े या सामान खरीदो। उनकी तस्वीरें खींचो। WhatsApp ग्रुप्स में सहेलियों और रिश्तेदारों को भेजो। फिर आर्डर आने पर उसे खुद पहुंचाओ। ना कोई दुकान, ना कोई बड़ी पूंजी, बस एक फोन, भरोसा और बात करने की कला। लेकिन इस पूरी व्यवस्था में एक बड़ा गैप दिखा। इन महिलाओं के पास ग्राहक थे, भरोसा था, बेचने की समझ थी। जो नहीं था वो थी सप्लाई चेन। हर बार खुद मार्केट जाना, खुद मोलभाव करना, खुद पैकिंग करना, खुद डिलीवरी करना यह सब इतना भारी काम था कि बिजनेस एक लिमिट के बाद बढ़ ही नहीं पाता था। यहीं से जन्म हुआ Meesho का मेरी शॉप का छोटा रूप। कंपनी ने कहा, अब मार्केट जाने की जरूरत नहीं। हमारे ऐप पर होलसेल के लाखों प्रोडक्ट हैं। तस्वीरें शेयर कीजिए, अपना मार्जिन जोड़िए, आर्डर आते ही हम सामान पैक करके ग्राहक तक पहुंचा देंगे। आपका काम बस इतना। लोगों से जुड़े रहिए। इसी को कहा गया सोशल कॉमर्स और यह चल निकला। लाखों महिलाएं रिसेलर बन गई। जिनमें से बहुतों ने पहली बार अपनी कमाई शुरू की। लेकिन कंपनी को जल्दी समझ आया कि यह रास्ता एक लिमिट तक ही जाता है और असली दांव अभी बाकी था। रिसेलर नेटवर्क बढ़ता है। अच्छा चलता है। पर एक पॉइंट के बाद रफ्तार धीमी पड़ जाती है। हर रिसेलर की अपनी लिमिट है। उतने ही कांटेक्ट्स, उतने ही ग्रुप्स। अगर भारत के असली ई-कॉमर्स मार्केट पर दावा करना है तो सीधे आम ग्राहक तक पहुंचना होगा और उसके लिए प्लेटफार्म पर लाखों सेलर्स चाहिए थे जो रोज नए प्रोडक्ट डालें कीमत घटाएं वैरायटी लाएं उन सेलर्स को लुभाने के लिए निकाला गया सबसे बड़ा हथियार 0% कमीशन लेकिन यह हथियार चला क्यों जरा गहराई से देखिए मान लीजिए आप एक छोटे शहर के कपड़े व्यापारी हैं। आपकी कुर्ती की लागत है ₹220 और आप चाहते हैं कि बिक्री पर हाथ में आए ₹290 यानी ₹70 का फायदा। लेकिन Amazon जैसी जगह पर सब चार्जेस जोड़कर वही कुर्ती ₹430 में लिस्ट होगी। और अब सबसे जरूरी सवाल। आपका कस्टमर आखिर है कौन? वो आम भारतीय जो ₹290 की कुर्ती ढूंढ रहा है। ₹430 की नहीं। यह बायर कीमत पर इतना सेंसिटिव है कि ₹50 का फर्क देखकर ऐप बदल देता है। शहरी ग्राहक के लिए ₹100 कम ज्यादा शायद मायने ना रखे लेकिन छोटे शहर के ग्राहक के लिए यही ₹100 पूरे हफ्ते का बजट है। Meesho ने ठीक यही गैप पकड़ा। कमीशन लोगे तो सेलर कीमत बढ़ाएगा। कीमत बढ़ी तो कस्टमर भागेगा। कस्टमर गया तो सेलर भी अपना सामान उठाकर चला जाएगा। इसलिए कमीशन ही हटा दो। नतीजा लाखों छोटे दुकानदार आए, करोड़ों ग्राहक आए और प्लेटफार्म भर गया। एक लाइन में कहें तो Meesho बाजार में आया नहीं, बाजार बनाने आया। लेकिन अब एक नई मुसीबत खड़ी हुई। सोचिए एक ऐसा मेला जहां दुकान लगाना बिल्कुल मुफ्त हो। कोई फी नहीं, कोई रजिस्ट्रेशन नहीं। नतीजा क्या होगा? वहां लाखों दुकानें लग जाएंगी। हर कोई अपना ठेला लगा देगा क्योंकि जोखिम ही क्या है? लेकिन अब मेले में घुसता है एक ग्राहक और उसकी आंख सबसे पहले किन दुकानों पर पड़ती है? वो दुकानें जो गेट के पास हैं जो मुख्य रास्ते पर हैं जो सामने दिख रही हैं। बाकी लाखों दुकानें भीड़ में दबी रह जाती हैं। वहां हैं बिल्कुल हैं। लेकिन किसी की नजर उन पर नहीं पड़ती। अब जरा इसी को Meesho के प्लेटफार्म पर देखिए। जब एक ही डिज़ाइन की कुर्ती बेचने वाले 500 अलग-अलग सेलर हो तो ग्राहक सर्च करेगा रेड कुर्ती। और स्क्रीन पर जो पहले तीन-चार प्रोडक्ट दिखेंगे बिक्री 90% मामलों में उन्हीं में से होगी। पांचवें पन्ने पर मौजूद सेलर को तो ग्राहक देखेगा भी नहीं। तो सवाल है प्लेटफार्म पर सबकी जगह बराबर है लेकिन विजिबिलिटी बराबर क्यों नहीं है? यहीं से मुफ्त की चादर के नीचे से असली कमाई बाहर निकलती है। क्योंकि मेले में दुकान लगाना मुफ्त है। लेकिन गेट के पास वाली जगह कभी मुफ्त नहीं होती। यहीं पर शुरू होता है पैसे का पहला बड़ा खेल। विजिबिलिटी यानी एडवरटाइजिंग। Meesho सेलर से कहता है, कमीशन हम नहीं लेते यह बात पक्की। लेकिन अगर आप चाहते हैं कि ग्राहक रेड कुर्ती सर्च करें तो सबसे पहले आपका प्रोडक्ट दिखे तो एड्स चलाइए। इसे कॉस्ट पर क्लिक कहते हैं। हर क्लिक पर पैसे कटते हैं। प्रोडक्ट बिके या ना बिके वो अलग बात है। अब ध्यान से देखिए यहां हुआ क्या? कमीशन का काम था पैसा कंपनी तक पहुंचाना। वही काम अब एड्स कर रहे हैं। बस नाम बदल गया है। फर्क बस इतना है कि कमीशन एक सीधा टैक्स था। बिक्री हुई हिस्सा दो। जबकि एड्स एक इनडायरेक्ट टैक्स [संगीत] है। दिखने के पैसे दो। बिक्री अपनी किस्मत और सेलर के पास चारा क्या है? अगर वो एड्स नहीं चलाएगा तो उसका प्रोडक्ट पन्ने 10 पर चला जाएगा। यानी मान लीजिए बिक्री नहीं के बराबर। इसीलिए वो खुशी-खुशी एड्स पर खर्च करता है क्योंकि उसे लगता है कम [संगीत] से कम कमीशन तो नहीं कट रहा। और यहां एक और बारीक बात जब एक सेलर एड्स चलाता है तो उसके बगल वाले सेलर का प्रोडक्ट नीचे खिसक जाता है। वो भी मजबूरन एड्स चलाने लगता है। यानी यह एक ऐसी दौड़ है जहां रुकना नुकसान है और दौड़ जितनी तेज होगी प्लेटफार्म की कमाई उतनी बढ़ेगी। यही मॉडल अखबारों में भी देखा जा सकता है। अखबार सस्ता क्यों होता है? क्योंकि असली पैसा उसमें छपने वाले विज्ञापनों से आता है। पाठक को सस्ती चीज मिलती है पर पूरा खेल उसकी नजर बेचने का है। लेकिन एड्स तो सेलर की मर्जी पर हैं। अगर कोई सेलर कभी एड्स ना चलाए तब भी असली इंजन कुछ और है जो हर आर्डर के साथ हर दिन चलता है। वो इंजन [संगीत] है डिलीवरी और लॉजिस्टिक्स। और यह इंजन हर दिन हर ऑर्डर पर बिना रुके चलता है। Amazon की अपनी [संगीत] डिलीवरी सर्विस है। Flipkart का अपना बड़ा नेटवर्क है। लेकिन Meesho के पास अपनी [संगीत] गाड़ियां नहीं है। अपने बड़े वेयर हाउसेस नहीं है। वो थर्ड पार्टी कूरियर कंपनियों से काम कराता है। वो कूरियर कंपनीज़ जो हजारों छोटे-बड़े प्लेटफॉर्म्स के पैकेट्स ठोती हैं। अब पैसा बनता कैसे है? नंबरों में देखिए। आपने आर्डर किया और डिलीवरी चार्ज लगा ₹70। लगता है यह ₹70 सीधे कूरियर कंपनी को जा रहे हैं? नहीं। Meesho एंड कूरियर कंपनियों को रोज लाखों पैकेट्स देता है। कभी-कभी एक ही दिन में 25 लाख से भी ज्यादा। इतने भारी वॉल्यूम के आगे कोई भी कूरियर कंपनी बड़ा [संगीत] डिस्काउंट देती है। क्योंकि उसकी गाड़ियां भरी रहें, रूट सेट रहे, बिजनेस प्रेडिक्टेबल रहे। तो मान लीजिए कूरियर कंपनी लेती है ₹52 पर पैकेट। बाकी बचे ₹18 सीधे Meesho की जेब में। यह ₹18 बहुत छोटा लगता है। है ना? लेकिन ₹18 को ₹25 लाख ऑर्डर से गुणा कीजिए। एक ही दिन में करोड़ों रुपए और यह हर दिन, हर महीने, हर साल। ऊपर से जब आर्डर कैंसिल होता है या रिटर्न आता है और फैशन कैटेगरी में रिटर्न बहुत होते हैं तो आने जाने दोनों तरफ की शिपिंग का बोझ सेलर [संगीत] भरता है। यानी जो पैकेट दो बार घूमा उसमें से फिर कुछ हिस्सा प्लेटफार्म का बनता है। यहां एक और बारीक बात समझिए। क्योंकि इसी से Meesho का असली फायदा समझ आता है। जब वॉल्यूम इतना बड़ा हो तो प्लेटफार्म धीरे-धीरे [संगीत] खुद रूट्स और हब्स कंट्रोल करने लगता है। यानी कम कीमत पर ज्यादा पैकेट्स और हर साल यह मार्जिन और चौड़ा होता जाता है। यानी Meesho सिर्फ एक शॉपिंग ऐप नहीं है। यह अंदर-अंदर एक विशाल लॉजिस्टिक्स कंपनी है जो हर पैकेट पर थोड़ा-थोड़ा काट कर रोज करोड़ों बनाती है। लेकिन अब सवाल अगर यह फार्मूला इतना तगड़ा है, तो Amazon और Flipkart ने इसे कॉपी क्यों नहीं कर लिया? कोशिश हुई है Flipkart ने Shopsi नाम का ऐप लॉन्च किया। वही 0% कमीशन, वही सस्ते प्रोडक्ट, वही छोटे शहरों पर नजर। लेकिन बड़ी कंपनियों के लिए पूरी तरह इस रास्ते पर उतरना आसान नहीं है क्योंकि उनकी लागत का ढांचा ही अलग बना हुआ है। Amazon का पूरा खेल स्पीड और एक्सपीरियंस पर टिका है। एक-द दिन में डिलीवरी, बढ़िया पैकिंग, [संगीत] आसान रिटर्न, भरोसेमंद सर्विस। इस वादे को पूरा करने के लिए शहर-शहर बड़े वेयर हाउसेस बनाने पड़ते हैं। लाखों कर्मचारी रखने पड़ते हैं। इन्वेंटरी पहले से जमा करनी पड़ती है। टेक्नोलॉजी पर भारी खर्च करना पड़ता है। यह पूरा ढांचा महंगा है और इसी ढांचे को चलाने के लिए कमीशन जरूरी है। अगर वह कमीशन हटा दें तो उनका पूरा सिस्टम घाटे में चला जाएगा। दूसरी तरफ Meesho के पास अपना बड़ा वेयर हाउस नहीं है। सामान सेलर के घर या दुकान से सीधा पैक होकर निकलता है। डिलीवरी में 5 से सात दिन लग जाते हैं। लेकिन कस्टमर इंतजार को तैयार है क्योंकि उसे ₹140 सस्ता सामान मिल रहा है। दो अलग खिलाड़ी, दो अलग वादे। एक कहता है कल तक पहुंच जाएगा। दूसरा कहता है दाम देखिए समय तो लगेगा। दोनों सही है। [संगीत] बस मैदान अलग है। और यही वजह है कि बड़ी कंपनियां इस मॉडल को पूरी तरह कॉपी नहीं कर पाती। क्योंकि यह सिर्फ एक प्राइसिंग फैसला नहीं है। पूरे ढांचे का फैसला है। लेकिन अब वो बात जो चमकते नंबर्स के पीछे छिप [संगीत] जाती है। जब किसी प्लेटफार्म पर एंट्री मुफ्त होती है तो हर तरह का सेलर आ जाता है। अच्छा भी और बहुत बुरा भी। कोई रोक-टोक नहीं, कोई बड़ी फीस नहीं तो जांच कम होती है। नतीजा सस्ती प्रोडक्ट की आड़ में बहुत सेलर खराब क्वालिटी का सामान भेजने लगे। ग्राहक फोटो में शानदार ड्रेस देखकर ऑर्डर करता है और पार्सल खोलते ही समझ आ जाता है कि यह वह चीज बिल्कुल नहीं थी। रंग अलग, कपड़ा पतला, नाप गलत। नतीजा रिटर्न की संख्या बहुत बढ़ गई और यहां असली नुकसान ग्राहक या प्लेटफार्म का नहीं सेलर का होता है। फॉरवर्ड शिपिंग, रिटर्न शिपिंग, पेनल्टी सब सेलर के हिस्से में जाता है। एक आर्डर कैंसिल हुआ तो सेलर ने शिपिंग तो भरी [संगीत] लेकिन बिक्री कुछ नहीं हुई। बहुत से छोटे सेलर यह शिकायत करते हैं कि कमीशन भले शून्य हो [संगीत] लेकिन एड्स का खर्च, रिटर्न का बोझ और पेनल्टीज मिलाकर असली मुनाफा गायब हो जाता है। तो, इस व्यवस्था में तीन खिलाड़ी हैं। ग्राहक खुश क्योंकि सस्ता सामान मिल रहा है। कंपनी खुश क्योंकि हर तरफ से थोड़ा-थोड़ा पैसा आ रहा है और बीच में खड़ा छोटा दुकानदार जो कई बार इसी चक्कर में दब जाता है। मुनाफा दिखता है, लेकिन हाथ में कम बचता है। तो वापस उसी सवाल पर जहां से हमने शुरुआत की थी। Meesho ने आखिर किया क्या? कमीशन खत्म नहीं किया। उसे तोड़कर अलग-अलग जगह बांट दिया। विजिबिलिटी के पैसे, डिलीवरी के पैसे, रिटर्न के पैसे, पेनल्टी के पैसे, छोटे-छोटे हिस्से लेकिन इतने ऑर्डर्स पर कि जोड़कर विशाल कमाई बन जाती है। कमीशन एक बड़ा टैक्स था जो साफ दिखता था। इसलिए दुकानदार उसे महसूस करता था और शिकायत करता था। अब वही पैसा छोटे-छोटे हिस्सों में बंट गया है। इतना बट गया कि अब कोई शिकायत ही नहीं करता। बल्कि अब दुकानदार खुश है कि कमीशन तो नहीं कट रहा। यही इस कहानी का सबसे बड़ा सबक है। बिजनेस की दुनिया में कोई चीज सच में मुफ्त [संगीत] नहीं होती। अगर कोई सर्विस मुफ्त लग रही है तो समझ लीजिए पैसा कहीं और से किसी और रास्ते से वसूला जा रहा है। बस वो जगह अभी आपकी नजर में नहीं आई है। और यह सिर्फ एक ऐप की कहानी नहीं है। जो एप्स आप रोज मुफ्त में इस्तेमाल करते हैं, जहां साइनअप पर इनाम मिलता है, जहां पहला आर्डर आधे दाम पर आता है, जहां नो कॉस्ट ईएमआई लिखा होता है, जहां कैशबैक मिलता है, उन सबके पीछे यही लॉजिक काम कर रहा है। पहले एंट्री आसान करो, आदत बनाओ, भरोसा जीतो। फिर वह पैसा वसूलो जिसका हिसाब रखना ग्राहक के लिए मुश्किल हो। तो अगली बार जब कोई कहे यह चीज बिल्कुल फ्री है। एक पल रुक कर जरूर सोचिएगा क्योंकि दुनिया की सबसे महंगी चीज अक्सर वही [संगीत] होती है जो सबसे पहले मुफ्त लगती है। आखिर में बस इतना सा नजरिया। Meesho ने भारत के करोड़ों छोटे शहरों के लोगों को पहली बार ऑनलाइन शॉपिंग [संगीत] सिखाई। वो लोग जिनके लिए बड़ी कंपनियां कभी बनी ही नहीं थी। उसने लाखों उन महिलाओं को कमाई का रास्ता दिया जो पहले सिर्फ WhatsApp ग्रुप्स तक सीमित थी। उसने साबित किया कि अगर करोड़ों लोगों तक पहुंचना है तो शुरुआती दरवाजे को चौड़ा और मुफ्त रखना पड़ता है। खर्च बाद में थोड़ा-थोड़ा करके कहीं और से निकल आता है। यह जादू नहीं है। यह इंसानी बर्ताव की गहरी [संगीत] समझ है। हम मुफ्त की तरफ खींचते हैं। सस्ते की तरफ भागते हैं और बाद में उसकी कीमत चुकाने को तैयार हो जाते हैं। इस कहानी में ना कोई विलेन है ना कोई हीरो। बस एक स्मार्ट सिस्टम [संगीत] है जो बना है हमारी अपनी आदतों से। और जो इस सिस्टम को समझ लेता है वो सिर्फ बेहतर ग्राहक नहीं बनता। वो बेहतर फैसले लेता है। तो अगली बार जब कोई मुफ्त का वादा सुने बस मुस्कुराइएगा और उसके पीछे छिपे रास्ते [संगीत] ढूंढिएगा। यह तो हो गई पैसे कमाने की बात। लेकिन पैसा कमाना एक बात है। उसे सही जगह लगाना बिल्कुल अलग बात। अगर आप यह समझना चाहते हैं कि आम आदमी अपनी कमाई, सेविंग और इन्वेस्टिंग को कैसे सही दिशा दे सकता है, तो मेरी एक और वीडियो है। आई विल टीच यू टू बी रिच। वो जरूर देखिए। वहां इसी तरह की बातें सीधी भाषा में बिना लाग लपेट के समझाई गई है।

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Assuntos: E-commerce, Plataformas e marketplaces, Marketing e SEO, Logística e pagamentos. Publicado no YouTube em 2026-10-27.

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