दो कमरों के फ्लैट से $16 अरब तक | Flipkart का पूरा इतिहास Flipkart Story
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Vídeo em Hindi, publicado pelo canal Build On हिंदी.
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वीडियो सारांश
यह वीडियो फ्लिपकार्ट की शुरुआत, अमेज़न के साथ मुकाबले और वॉलमार्ट द्वारा इसे खरीदने की पूरी कहानी प्रस्तुत करता है। इसमें दो दोस्तों द्वारा एक छोटे फ्लैट से किताबें बेचने से लेकर भारत की सबसे बड़ी ई-कॉमर्स कंपनी बनने तक के सफर को दिखाया गया है।
मुख्य बिंदु
- सचिन बंसल और बिन्नी बंसल ने अमेज़न की नौकरी छोड़कर 2007 में बेंगलुरु के एक छोटे फ्लैट से फ्लिपकार्ट की शुरुआत की।
- शुरुआत में ऑनलाइन पेमेंट पर अविश्वास और डर को दूर करने के लिए फ्लिपकार्ट ने 'कैश ऑन डिलीवरी' का विकल्प पेश किया।
- 2013 में अमेज़न और स्नैपडील के प्रवेश के बाद भारी डिस्काउंट और प्रतिस्पर्धा का दौर शुरू हुआ।
- 2014 के 'बिग बिलियन डे' सेल में भारी ट्रैफिक के कारण वेबसाइट क्रैश होने पर संस्थापकों ने जनता के सामने गलती स्वीकार की और माफी मांगी।
- 2018 में वॉलमार्ट ने फ्लिपकार्ट का लगभग 77% हिस्सा लगभग 16 अरब डॉलर में खरीद लिया।
विषय
ई-कॉमर्सऑनलाइन शॉपिंगस्टार्टअपकैश ऑन डिलीवरीअमेज़नवॉलमार्टफ्लिपकार्टडिजिटल पेमेंट
वीडियो का ट्रांसक्रिप्ट
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क्या आप दो ऐसे लड़कों की कंपनी के लिए $ बिलियन देंगे जो एक छोटे से फ्लैट से किताबें बेच रहे थे? Walmart ने दिए। लेकिन क्यों? आज की कहानी में हम देखेंगे कि कैसे दो दोस्तों ने Amazon की नौकरी छोड़ी। Amazon के ही सामने खड़े हुए और भारत की सबसे बड़ी ई-कॉमर्स कंपनी बना दी। इसमें बड़ी जीत है, शर्मनाक गिरावट है और एक ऐसा मोड़ है जिसने सब कुछ बदल दिया। तो चलिए शुरू से शुरू करते हैं। कहानी शुरू होती है चंडीगढ़ से। यहां दो लड़के बड़े हो रहे थे। सचिन बंसल और बिन्नी बंसल। दोनों का सरनेम एक है। इसलिए लोग उन्हें भाई समझ लेते हैं। लेकिन दोनों का आपस में कोई रिश्ता नहीं है। दोनों ने आईआईटी दिल्ली में पढ़ाई की और वहीं उनकी दोस्ती हुई। आगे चलकर दोनों Amazon में काम करने पहुंचे और यहीं से कहानी का सबसे अहम मोड़ शुरू होता है। क्योंकि Amazon में काम करते हुए इन दोनों ने वो देखा जो उस समय भारत में बहुत कम लोगों ने देखा था। इन्होंने देखा कि इंटरनेट पर सामान बेचने का पूरा सिस्टम अंदर से कैसे चलता है और तभी उनके मन में एक सवाल आया अगर यह अमेरिका में हो सकता है तो भारत में क्यों नहीं? सचिन और बिन्नी की जोड़ी भी दिलचस्प थी। कहा जाता है कि सचिन बड़ी तस्वीर देखने वाले इंसान थे। यानी कंपनी कहां जाएगी और बाजार कहां खुलेगा और बिन्नी का जोर टेक्नोलॉजी और सिस्टम को जमीन पर चलाने पर था। एक सपना देखता था और दूसरा उस सपने को चलाने वाली मशीन बनाता था। लेकिन आईडिया सुनते ही लोगों ने उन्हें समझाना शुरू कर दिया। किसी ने कहा भारत अभी इसके लिए तैयार नहीं है। किसी ने कहा इतनी अच्छी नौकरी क्यों छोड़ रहे हो? लेकिन इन दोनों को एक बात समझ आ चुकी थी। अगर आप हर बार लोगों की राय का इंतजार करेंगे तो कोई नई चीज कभी शुरू नहीं होगी। साल 2007 भारत में इंटरनेट अभी धीमा था और ऑनलाइन शॉपिंग की बात सुनकर ज्यादातर लोग हंस देते थे। कौन अनजान वेबसाइट पर पैसा डालकर सामान मंगवाएगा जब दुकान ग्री के कोने पर है। लेकिन सचिन और बिन्नी को यही सवाल एक मौका दिखा। उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी। सोचिए कितना बड़ा जोखिम था। कोई पक्की कमाई नहीं। कोई गारंटी नहीं। बेंगलुरु के कोरमंगला में एक छोटा सा दो कमरों का फ्लैट लिया गया। वही उनका ऑफिस था। वही गोदाम। जेब में बस कुछ लाख, एक लैपटॉप और एक बड़ा सपना। कंपनी का नाम रखा गया Flipkart। और बेचने के लिए चुनी गई किताबें क्योंकि किताबें हल्की होती हैं। आसानी से भेजी जा सकती हैं और छोटे शहरों में अच्छी किताबें ढूंढना बहुत मुश्किल था। कहा जाता है कि शुरू में वे खुद किताबें पैक करते थे और खुद ही डिलीवरी के लिए निकल [गला साफ़ करने की आवाज़] पड़ते थे। कोई बड़ी टीम नहीं, कोई शानदार ऑफिस नहीं। बस दो दोस्त और हर आर्डर को अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा आर्डर मानने की जिद। शुरुआत के दिनों की एक बात और दिलचस्प है। उनके पास किताबों का बड़ा गोदाम नहीं था। कहा जाता है कि जब कोई आर्डर आता तब वे दुकानों और सप्लायर्स से वह किताब खोज कर लाते थे और फिर उसे ग्राहक तक पहुंचाते थे। आर्डर आता फोन बजता ग्राहक पूछता कि मेरी किताब कब आएगी और जवाब भी उन्हें खुद ही देना पड़ता था। कभी पता गलत निकलता कभी किताब नहीं मिलती देर हो जाती। हर गलती का मतलब था एक ग्राहक का भरोसा टूटना। और जब आपके पास सिर्फ मुट्ठी भर ग्राहक हो, तो हर एक ग्राहक आपकी पूरी दुनिया होता है। इसीलिए उन्होंने एक नियम बना लिया ग्राहक को कभी निराश मत करो। धीरे-धीरे लोग एक दूसरे को बताने लगे कि यहां से किताब मंगवाने पर सही हालत में सही समय पर मिलती है। और बिना किसी बड़े विज्ञापन के लोगों की जुबान ने Flipkart को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया। लेकिन जल्दी ही एक बड़ी दीवार सामने आ गई। भारत में लोगों को ऑनलाइन पेमेंट पर भरोसा नहीं था। बहुत कम लोगों के पास क्रेडिट कार्ड था और जिनके पास था वह भी अपना कार्ड नंबर इंटरनेट पर डालने से डरते थे। सोचिए आप पैसे भेजें और सामान कभी आए ही नहीं तो Flipkart के सामने सबसे बड़ी चुनौती किताबें बेचना नहीं थी। सबसे बड़ी चुनौती थी लोगों का डर और यह डर सिर्फ पैसे का नहीं था। भारत में लोग खरीददारी में भरोसा चेहरों पर करते थे। मोहल्ले का दुकानदार जानता था। आप उसे जानते थे और जरूरत पड़ने पर आप उसकी दुकान पर जाकर बहस भी कर सकते थे। लेकिन इंटरनेट पर ना कोई चेहरा था, ना कोई दुकान। अगर सामान खराब निकल जाए, तो कहां जाएंगे? किससे बात करेंगे? इस सवाल का जवाब देना बहुत जरूरी था। तब Flipkart ने एक ऐसा फैसला लिया जिसने सब कुछ बदल दिया। कैश ऑन डिलीवरी। यानी सामान पहले हाथ लीजिए। देखिए और पैसे तभी दीजिए जब आपको तसल्ली हो। सुनने में यह एक छोटा सा आईडिया लगता है। लेकिन इसने करोड़ों भारतीयों के मन से सबसे बड़ा डर निकाल दिया। अब ऑनलाइन खरीदना जोखिम नहीं रहा। अब यह एक आदत बनने लगी। जैसे-जैसे आर्डर बढ़े एक नई मुसीबत आई। कैश ऑन डिलीवरी को संभालने के लिए एक मजबूत डिलीवरी सिस्टम चाहिए था। Flipkart ने अपना खुद का नेटवर्क बनाना शुरू किया जो आगे चलकर एक आर्ट कहलाया। यह बहुत महंगा काम था। इसके लिए बहुत पैसा चाहिए था। तब बड़े निवेशक आए। Excel, फिर टाइगर ग्लोबल। पैसा आया और कंपनी ने रफ्तार पकड़ ली। किताबों के बाद मोबाइल, लैपटॉप, घरेलू सामान सब कुछ बिकने लगा और लोग कहने लगे, बस Flipkart पर देख लो। सबसे बड़ी बात यह थी कि Flipkart सिर्फ बड़े शहरों तक नहीं रुका। उन शहरों और कस्बों में जहां बड़े ब्रांड के स्टोर थे ही नहीं, वहां भी लोग अब वही सामान मंगवा सकते थे, जो बड़े शहरों वाले खरीद रहे थे। छोटे शहर के लड़के के लिए पहली बार मोबाइल, लैपटॉप या कपड़े उसी चॉइस के साथ उपलब्ध थे। इसी दौरान Flipkart ने अपने मॉडल में भी बदलाव किया। उसने सिर्फ खुद सामान बेचने की जगह दूसरे विक्रेताओं को भी अपने प्लेटफार्म पर जोड़ना शुरू किया। यानी Flipkart अब एक दुकान नहीं एक बाजार बन रहा था और जो बाजार बन जाता है उसकी ताकत कई गुना बढ़ जाती है। लेकिन जहां बड़ी सफलता होती है वहां बड़ा खतरा भी आता है। साल 2013 भारत में आया Amazon वही Amazon जहां कहीं सचिन और बिन्नी खुद काम करते थे। अब सोचिए इस पल को। जिस कंपनी से आपने सीखा वही आपके घर में आपको टक्कर देने आ गई है। उसके पास अथा पैसा था। दुनिया भर का अनुभव था और भारत जीतने का पक्का इरादा था। उधर Snapde भी तेजी से बढ़ रहा था। मुकाबला शुरू हुआ भारी डिस्काउंट, तेज डिलीवरी और बड़े ऑफर्स का। ग्राहक के लिए यह मौज थी। लेकिन कंपनियों के लिए यह खतरनाक खेल था। क्योंकि घाटे में बेचने से खजाना तेजी से खाली होता है। सोचिए हर साल त्यौहार का मौसम आता और तीनों कंपनियां ग्राहकों को खींचने के लिए एक दूसरे से सस्ता और ज्यादा सस्ता सामान बेचने की होड़ में लग जाती। टीवी पर विज्ञापन, अखबारों में पूरे पन्ने के ऑफर, हर तरफ बस एक ही शोर था। इस लड़ाई में जीतने वाला वो नहीं था जिसके पास सबसे अच्छा आईडिया हो। जीतने वाला वो था जिसके पास सबसे ज्यादा समय तक टिके रहने का पैसा हो। और यहीं पर Flipkart के लिए सबसे बड़ी चिंता थी। क्योंकि Amazon के पीछे दुनिया की एक विशाल कंपनी खड़ी थी और Flipkart को हर कुछ समय बाद निवेशकों से नया पैसा जुटाना पड़ता था। इसी जंग के बीच Flipkart ने फैशन की कंपनी Mnttra को खरीद लिया। अब वो सिर्फ गैजेट्स की दुकान नहीं थी। वो भारत का सबसे बड़ा ऑनलाइन बाजार बनने की तरफ बढ़ रही थी। और फिर आया वो दिन जिसे Flipkart कभी नहीं भूलेगा। 6 अक्टूबर 2014 बिग बिलियन डे। लाखों लोग इस सेल का इंतजार कर रहे थे। सेल शुरू हुई और अगले ही पल वेबसाइट पर इतना ट्रैफिक आया जितना कंपनी ने सोचा भी नहीं था। साइट अटकने लगी। पेज खुलना बंद हो गए। कई ऑर्डर बीच में ही फंस गए। ग्राहक गुस्से में थे। सोशल मीडिया पर आलोचना की बाढ़ आ गई। जिस दिन Flipkart अपनी सबसे बड़ी जीत मनाने वाला था, उसी दिन उसे सबसे बड़ी शर्मिंदगी झेलनी पड़ी। अब सवाल था वो क्या करेगा? सचिन और बिन्नी ने सबके सामने अपनी गलती मानी और ग्राहकों से माफी मांगी। यह आसान नहीं था। लेकिन इसी ईमानदारी ने ग्राहकों का भरोसा बचा लिया और Flipkart ने सबक सीखा। अपने सिस्टम मजबूत किए और अगली सेल्स को पहले से कहीं बेहतर बनाया। आज बिग बिलियन डेज करोड़ों लोगों के लिए त्यौहार जैसा बन चुका है। लेकिन उस पहले दिन की कहानी सिर्फ वेबसाइट अटकने की नहीं थी। कई लोगों ने शिकायत की कि जिन चीजों के लिए वे घंटों इंतजार कर रहे थे, वे अचानक स्टॉक से बाहर दिखने लगे। कुछ ऑर्डर बाद में रद्द करने पड़े। लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसी सेल ने भारत में ऑनलाइन फेस्टिव सेल्स की एक नई परंपरा शुरू कर दी। बाद में Amazon भी ऐसे ही बड़े त्यौहारी सेल लेकर आया। यानी Flipkart ने जो गिर कर सीखा पूरी इंडस्ट्री ने उसे दोहराया। लेकिन अब कंपनी पर दबाव बढ़ता जा रहा था। Amazon से लड़ाई में हर चीज पर भारी खर्च हो रहा था और निवेशक पूछ रहे थे कमाई कब होगी? उसी बीच Flipkart ने डिजिटल पेमेंट में कदम रखा और PhonePe को अपने साथ जोड़ लिया। साल 2017 तक Flipkart ने दुनिया भर के बड़े निवेशकों की दिलचस्पी थी। SF Bank, TST, EB और Microsoft जैसे नाम इस कंपनी से जुड़े। यह भरोसे का संकेत था। लेकिन साथ ही यह भी बता रहा था कि Flipkart को अपनी जंग लड़ने के लिए लगातार भारी पैसे की जरूरत है। और यह सब कुछ दुनिया की सबसे बड़ी रिटेल कंपनी की नजर से छुपा नहीं था। और तभी दुनिया की सबसे बड़ी रिटेल कंपनी की नजर Flipkart पर पड़ी। Walmart साल 2018 ने Flipkart का लगभग 77% हिस्सा खरीदने का ऐलान किया। कीमत करीब 16 बिलियन। यह उस समय की सबसे बड़ी ई-कॉमर्स डील्स में से एक थी। 11 साल पहले एक छोटे से फ्लैट में दो दोस्तों ने किताबें बेचने से शुरुआत की थी और आज दुनिया की सबसे बड़ी रिटेलर उनकी कंपनी को अरबों डॉलर में खरीद रही थी। लेकिन इस जीत के साथ एक भावुक मोड़ भी आया। सचिन बंसल ने अपनी पूरी हिस्सेदारी बेच दी और Flipkart से बाहर निकल गए। कुछ समय बाद बिन्नी बंसल ने भी कंपनी छोड़ दी। उन पर निजी आचरण से जुड़े आरोप लगे जिन्हें उन्होंने मानने से इंकार किया। जिन दो दोस्तों ने Flipkart को जन्म दिया था वही उसके अंदर नहीं रहे। लेकिन Walmart ने यह सौदा क्यों किया? क्योंकि भारत दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्ता बाजारों में से एक है और वहां ऑनलाइन खरीदारी अभी शुरुआती दौर में थी। Walmart के सामने Amazon जैसा बड़ा प्रतिद्वंदी भी था और भारत में उसे एक मजबूत साथी चाहिए था। Flipkart के पास ग्राहक थे, ब्रांड था और भारतीय बाजार की गहरी समझ थी। Walmart के पास पैसा था, ताकत थी और दुनिया भर का सप्लाई चेन का अनुभव। दोनों को एक दूसरे की जरूरत थी। सौदे के बाद सचिन बंसल ने वित्तीय सेवाओं की दुनिया में नई कंपनी शुरू की। बिन्नी बंसल ने भी निवेश और नए स्टार्टअप्स की दिशा में कदम बढ़ाया। उधर PhonePe बाद में अलग होकर अपनी पहचान बनाने लगा और Flipkart आज भी Amazon के साथ मुकाबले में डटा हुआ है। तो अब जवाब सुनिए Walmart ने $6 बिलियन क्यों दिए? क्योंकि Flipkart ने तीन ऐसे काम कर दिए थे जो पैसे से नहीं खरीदे जा सकते थे। पहला उसने भारतीयों का ऑनलाइन खरीदारी पर भरोसा जीता। कैश ऑन डिलीवरी जैसे सीधे-साधे आईडिया से। दूसरा उसने करोड़ों ग्राहकों को ऑनलाइन शॉपिंग की आदत डाली। और तीसरा उसने Amazon जैसे दिग्गज के सामने भी अपना ब्रांड जिंदा रखा। इस कहानी से तीन बड़े सबक मिलते हैं। पहला सबक बड़ा बिजनेस बड़े पैसे से नहीं बल्कि लोगों के सबसे बड़े डर को हल करने से शुरू होता है। Flipkart के लिए वो डर था ऑनलाइन पेमेंट का और जवाब था कैश ऑन डिलीवरी। दूसरा सबक गलती हर किसी से होती है। लेकिन उसे ईमानदारी से मानना ही असली ताकत है। बिग बिलियन डे की माफी इसका सबूत है। और तीसरा सबक आप जिससे सीखते हैं कभी-कभी उसी से मुकाबला भी करना पड़ता है। तब सपने पर भरोसा ही आपका सबसे बड़ा हथियार होता है। अगर कहानी पसंद आई तो बिल्ड ऑन हिंदी को सब्सक्राइब जरूर कीजिए। और कमेंट में बताइए अगली कहानी आप किस कंपनी की सुनना चाहेंगे?
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Assuntos: E-commerce, Plataformas e marketplaces, Logística e pagamentos. Publicado no YouTube em 2026-11-06.
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