The Truth About Meesho's 0% Commission | How They Actually Make Money
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Vídeo em Hindi, publicado pelo canal Aj Wealth Work.
इस सामग्री के बारे में: नीचे दिया गया सारांश, मुख्य बिंदु और विषय वीडियो की ट्रांसक्रिप्ट से स्वचालित रूप से तैयार किए गए हैं। वे वीडियो में प्रस्तुत सामग्री, राय, दावों और भविष्यवाणियों को दर्शाते हैं और All The Gate की ओर से किसी समर्थन, सत्यापन या तथ्य-जांच का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं।
वीडियो सारांश
यह वीडियो Meesho के शून्य-कमीशन बिजनेस मॉडल का विश्लेषण करता है। इसमें बताया गया है कि Meesho बिना कमीशन लिए लॉजिस्टिक्स और विज्ञापन (advertising) के जरिए कैसे कमाई करता है, साथ ही इसके वित्तीय प्रदर्शन और सेलर्स के सामने आने वाली चुनौतियों पर भी चर्चा की गई है।
मुख्य बिंदु
- Amazon और Flipkart जैसी ई-कॉमर्स कंपनियां हर सेल पर 5% से 25% तक कमीशन लेती हैं, जबकि Meesho अपने प्लेटफॉर्म पर शून्य कमीशन मॉडल पर काम करता है।
- Meesho की शुरुआत 2015 में हुई थी और शुरुआती दौर में यह रीसेलर्स और सोशल कॉमर्स पर आधारित था, जिसे बाद में एक बड़े ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म में बदला गया।
- शून्य कमीशन होने के बावजूद Meesho लॉजिस्टिक्स (जैसे वाल्मो नेटवर्क) और विज्ञापन (ऐड्स) के जरिए राजस्व उत्पन्न करता है।
- Meesho का फोकस भारत के मूल्य-संवेदनशील (price-sensitive) ग्राहकों पर है, जो कम कीमत पर उत्पाद खरीदना पसंद करते हैं।
- वित्तीय वर्ष 2026 में Meesho ने ₹1,626 करोड़ का राजस्व दर्ज किया, लेकिन इसके बावजूद कंपनी को ₹1,300 करोड़ से अधिक का शुद्ध घाटा (net loss) हुआ।
- जीरो कमीशन मॉडल होने के बावजूद सेलर्स के लिए उत्पाद की गुणवत्ता, शिपिंग शुल्क और रिटर्न के कारण मुनाफा कमाना आसान नहीं होता है।
विषय
ई-कॉमर्सजीरो कमीशनबिजनेस मॉडललॉजिस्टिक्सविज्ञापनवित्तीय परिणामसोशल कॉमर्स
वीडियो का ट्रांसक्रिप्ट
उपलब्ध कैप्शन का पाठ; इसमें त्रुटियाँ हो सकती हैं।
सोचो Amazon और Flipkart पर जब आप कोई प्रोडक्ट बेचते हो, तो प्लेटफार्म आपसे हर सेल पर 5% से लेकर 25% तक कमीशन ले सकता है। लेकिन एक कंपनी आई और उसने कहा हम जीरो कमीशन लेंगे। इस कंपनी का नाम है Meesho। आज Meesho स्टॉक मार्केट में लिस्ट हो चुकी है। कंपनी ने फाइनेंसियल ईयर 2026 में ₹1,626 करोड़ का रेवेन्यू कमाया। लेकिन हैरानी की बात देखो इतना बड़ा बिजनेस होने के बावजूद कंपनी को एक साल में ₹1300 करोड़ से भी ज्यादा का लॉस हुआ। तो सवाल है अगर MSHO कमीशन नहीं लेता तो पैसा कमाता कहां से है? और जो सेलर Meesho पर फ्री में प्रोडक्ट्स बेच रहा है क्या वो सच में प्रॉफिट कमा पाता है? आज की वीडियो में हम Meesho के इसी बिजनेस मॉडल को डिकोड करेंगे और समझेंगे कि जीरो कमीशन के पीछे असली गेम क्या है। सबसे पहले समझते हैं कि Amazon और Flipkart का बिजनेस मॉडल कैसे काम करता है। मान लो आप एक सेलर हो और आपने प्लेटफार्म पर ₹1000 की शर्ट बेचीं। अब प्लेटफार्म आपसे हर सेल का एक हिस्सा लेता है। इसी को कमीशन कहते हैं। प्रोडक्ट की कैटेगरी के हिसाब से यह कमीशन लगभग 5% से लेकर 25% तक हो सकता है। अब एक सिंपल एग्जांपल देखते हैं। अगर आपकी ₹1000 की शर्ट बिकती है और प्लेटफार्म 15 से 20% कमीशन लेता है तो 150 से ₹200 प्लेटफार्म के पास चले जाते हैं। यानी सेल का एक हिस्सा प्लेटफार्म की कमाई बन जाता है। लेकिन फिर Meesho आया और उसने कहा हम कमीशन नहीं लेंगे। अब सवाल है क्या कोई कंपनी बिना पैसे लिए बिजनेस चला सकती है? बिल्कुल नहीं। तो फिर Meesho का असली बिजनेस मॉडल क्या है? यह समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा। साल था 2015। आईआईटी दिल्ली के दो दोस्तों ने एक स्टार्टअप शुरू किया। इसका नाम था फैशन ईयर। आईडिया सिंपल था। लोग अपने आसपास की दुकानों से ऑनलाइन कपड़े आर्डर कर सकें। लेकिन यह आईडिया काम नहीं कर पाया। दुकान वालों को ऑनलाइन बेचने में ज्यादा इंटरेस्ट नहीं था। पर इसी फेलियर के बीच दोनों फाउंडर्स ने एक इंटरेस्टिंग चीज नोटिस की। छोटे शहरों में कई हाउसवाइफ्स होलसेल मार्केट से कपड़े खरीदती थी। फिर उन कपड़ों की फोटो खींचती थी और WhatsApp ग्रुप्स के थ्रू अपनी सहेलियों और रिश्तेदारों को बेचती थी। यानी बिना किसी फिजिकल शॉप के घर बैठे बिजनेस चल रहा था। लेकिन इन सेलर्स के सामने एक प्रॉब्लम थी। कस्टमर्स तो थे लेकिन सप्लाई चेन नहीं थी। कपड़े खरीदने मार्केट जाना पड़ता था। पैकिंग खुद करनी पड़ती थी और डिलीवरी का इंतजाम भी खुद ही करना पड़ता था। यहीं से एक नया आईडिया निकला। Meesho यानी मेरी शॉप। इसका मैसेज सिंपल था। आप प्रोडक्ट्स बेचो, अपना मार्जिन जोड़ो और डिलीवरी की टेंशन हमें लेने दो। इस मॉडल को सोशल कॉमर्स कहा गया। धीरे-धीरे यह मॉडल पॉपुलर होने लगा। लेकिन फिर Meesho को समझ आया कि सिर्फ रिसेलर्स के भरोसे बहुत बड़ा बिजनेस खड़ा करना मुश्किल है। इसलिए कंपनी ने कस्टमर्स को सीधा अपने ऐप पर लाना शुरू किया और कस्टमर्स को अट्रैक्ट करने के लिए चाहिए थे लाखों सेलर्स। इन सेलर्स को अपने प्लेटफार्म पर लाने के लिए Meesho ने एक बड़ा डिसीजन लिया। ज़ीरो कमीशन। अब समझते हैं कि Meesho का जीरो कमीशन मॉडल काम कैसे करता है। एक छोटे शहर के कपड़े के व्यापारी को इमेजिन करो। वह एक कुर्ती बनाने में ₹200 खर्च करता है और उसे ₹250 में बेचना चाहता है। अब अगर प्लेटफार्म उससे कमीशन लेता है तो उसका प्रॉफिट कम हो सकता है। शिपिंग और दूसरे खर्चे भी हो तो सेलर को अपना मार्जिन बचाने के लिए प्रोडक्ट की प्राइस बढ़ानी पड़ सकती है। ध्यान रहे यह एक सिंपल एग्जांपल है। एक्चुअल कॉस्ट्स और मार्जिनस प्रोडक्ट और सेलर के हिसाब से अलग हो सकते हैं। Meesho ने इसी प्रॉब्लम को टारगेट किया। उसका फोकस सिर्फ बड़े शहरों के अमीर कस्टमर्स पर नहीं था। कंपनी उन कस्टमर्स तक पहुंचना चाहती थी जो कम प्राइस में प्रोडक्ट्स खरीदना चाहते हैं। यानी इंडिया का प्राइस सेंसिटिव मार्केट। अब कमीशन हटा दिया जाए तो सेलर के पास प्राइस कम रखने की ज्यादा फ्लेक्सिबिलिटी आ सकती है। प्राइस कम होगी तो कस्टमर्स आने के चांसेस बढ़ेंगे। कस्टमर्स बढ़ेंगे तो और सेलर्स प्लेटफार्म पर आएंगे और ज्यादा सेलर्स आएंगे तो कस्टमर्स को और ऑप्शंस मिलेंगे। इस तरह एक साइकिल बन जाती है। बिजनेस की लैंग्वेज में इसे फ्लाई व्हील इफेक्ट कहा जाता है। इसको एक सिंपल एग्जांपल से समझो। Amazon को एक बड़े मॉल की तरह इमेजिन करो। वहां दुकान लगाने के लिए आपको मॉल के रूल्स फॉलो करने पड़ते हैं और सेल पर कमीशन भी देना पड़ सकता है। वहीं Meesho का मॉडल ऐसा है जैसे एक ऐसी मार्केट जहां दुकान लगाने के लिए कमीशन नहीं देना पड़ता। सुनने में बहुत अच्छा लगता है। है ना? लेकिन यहां एक प्रॉब्लम है। अगर एक ही मार्केट में 1 लाख सेलर्स अपनी दुकान लगा दें तो कस्टमर आपकी दुकान तक पहुंचेगा कैसे? और यहीं से शुरू होती है Meesho की कमाई की असली कहानी। Meesho के बिजनेस मॉडल में दो इंपॉर्टेंट रेवेन्यू सोर्सेस को समझना जरूरी है। पहला है लॉजिस्टिक्स यानी डिलीवरी से जुड़ा बिजनेस और दूसरा है एडवरटाइजिंग यानी एड्स। सबसे पहले लॉजिस्टिक्स की बात करते हैं। Meesho पर जीरो कमीशन का मतलब यह नहीं है कि सेलर को डिलीवरी फ्री मिलती है। सेलर को शिपिंग चार्जेस देने पड़ सकते हैं। यह चार्जेस प्रोडक्ट के वेट, डिलीवरी ज़ोन और पेमेंट मोड जैसे फैक्टर्स पर डिपेंड करते हैं। और यहीं पर Meesho के लॉजिस्टिक्स नेटवर्क वाल्मo की एंट्री होती है। Meesho के पास अपनी हर डिलीवरी के लिए खुद की गाड़ियों का बड़ा फ्लट होना जरूरी नहीं है। इसके बजाय कंपनी ने वाल्मो नाम का एक लॉजिस्टिक्स नेटवर्क डेवलप किया। यह नेटवर्क अलग-अलग लॉजिस्टिक्स पार्टनर्स, सॉर्टिंग सेंटर्स और डिलीवरी एजेंट्स को कनेक्ट करता है। सॉफ्टवेयर की मदद से ऑर्डर्स को सही डिलीवरी नेटवर्क के थ्रू रूट किया जाता है। कंपनी के आईपीओ डॉक्यूमेंट्स के मुताबिक फाइनेंसियल ईयर 2026 की पहली छमाही में लगभग 64% शिपमेंट्स वाल्मo नेटवर्क के थ्रू गए थे। फाइनेंसियल ईयर 2023 में यह हिस्सा सिर्फ लगभग 1 8% था। यानी कुछ ही सालों में वाल्मो का रोल काफी बढ़ गया। अब समझते हैं कि इससे पैसा कैसे बन सकता है। मान लो किसी ऑर्डर की डिलीवरी के लिए सेलर से ₹7 शिपिंग चार्ज लिया गया और उस ऑर्डर को डिलीवर करने के लिए लॉजिस्टिक्स पार्टनर्स को ₹45 देने पड़े। तो इस एग्जांपल में ₹15 का डिफरेंस बचता है। लेकिन ध्यान रहे यह सिर्फ समझाने के लिए एक हाइपोटेटिकल एग्जांपल है। एक्चुअल शिपिंग चार्जेस, डिलीवरी कॉस्ट्स और मार्जिनस अलग हो सकते हैं। अब आप सोच रहे होंगे ₹15 से क्या होगा? लेकिन बिजनेस में असली गेम वॉल्यूम का होता है। जब हर दिन लाखों ऑर्डर्स प्रोसेस होते हैं, तो छोटे-छोटे अमाउंट्स भी मिलकर एक बड़ी रकम बन सकते हैं। यही लार्ज स्केल बिजनेस का एडवांटेज है। लेकिन लॉजिस्टिक्स के अलावा Meesho के पास कमाई का एक और इंपॉर्टेंट रास्ता है और वो है एडवरटाइजिंग। अब एक सिचुएशन इमेजिन करो। Meesho पर एक ही डिजाइन की रेड कुर्ती 500 अलग-अलग सेलर्स बेच रहे हैं। अब कस्टमर ऐप खोलता है और सर्च करता है रेड कुर्ती। लेकिन कस्टमर सभी 500 प्रोडक्ट्स नहीं देखेगा। वो कुछ ही प्रोडक्ट्स पर क्लिक करेगा। तो सवाल है कौन सा सेलर चाहेगा कि उसका प्रोडक्ट सर्च रिजल्ट्स में सबसे ऊपर दिखे। ऑब्वियसली हर सेलर चाहेगा कि कस्टमर सबसे पहले उसका प्रोडक्ट देखे। और यहीं पर एडवरटाइजिंग का गेम शुरू होता है। Meesho सेलर्स को अपने प्रोडक्ट्स प्रमोट करने के लिए एड्स का ऑप्शन दे सकता है। सेलर अपने प्रोडक्ट की विजिबिलिटी बढ़ाने के लिए एडवरटाइजिंग पर पैसा खर्च करता है। कुछ एडवरटाइजिंग मॉडल्स में सेलर को क्लिक के बेसिस पर चार्ज किया जाता है। यानी कस्टमर ने ऐड पर क्लिक किया तो चार्ज लग सकता है। चाहे उस क्लिक से सेल हो या ना हो। इस तरह प्लेटफार्म को एडवरटाइजिंग से रेवेन्यू मिल सकता है। अब ध्यान से समझो। Meesho ने कमीशन को जीरो कर दिया। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि प्लेटफार्म के पास कमाई के दूसरे रास्ते नहीं है। लॉजिस्टिक्स और एडवरटाइजिंग जैसे सोर्सेस से कंपनी रेवेन्यू जनरेट कर सकती है। यानी बिजनेस का चार्जिंग मॉडल बदल गया और यही Meesho के बिजनेस मॉडल का एक इंपॉर्टेंट पार्ट है। अब सवाल है जब Meesho का जीरो कमीशन मॉडल इतना अट्रैक्टिव है तो Amazon और Flipkart ने इसे पूरी तरह कॉपी क्यों नहीं किया? असल में कंपटीशन इतना सिंपल नहीं है। Flipkart ने शॉपी नाम का प्लेटफार्म ल्च किया था जो लो प्राइस शॉपिंग और छोटे शहरों के कस्टमर्स पर फोकस करता है। लेकिन हर कंपनी का बिजनेस मॉडल और कॉस्ट स्ट्रक्चर अलग होता है। Amazon और Flipkart जैसे प्लेटफॉर्म्स ने अपने लॉजिस्टिक्स, वेयर हाउसेस और डिलीवरी सिस्टम्स में बड़े इन्वेस्टमेंट्स किए हैं। इनका फोकस कई कैटेगरीज में फास्ट डिलीवरी और कस्टमर एक्सपीरियंस पर भी होता है। वहीं Meesho का मॉडल ज्यादा प्राइस सेंसिटिव कस्टमर्स को अट्रैक्ट करने पर फोकस करता है। सेलर प्रोडक्ट्स पैक करता है और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क उन्हें कस्टमर्स तक पहुंचाता है। कुछ ऑर्डर्स की डिलीवरी में ज्यादा समय भी लग सकता है। लेकिन जो कस्टमर कम प्राइस को प्रायोरिटी देता है, वो कभी-कभी डिलीवरी के लिए थोड़ा वेट करने को तैयार हो सकता है। यानी Meesho और उसके कंपेटिटर्स सिर्फ प्राइस पर कंपेट नहीं कर रहे। उनके बिजनेस मॉडल्स, कॉस्ट्स और टारगेट कस्टमर्स में भी फर्क है और यही फर्क कंपटीशन को इंटरेस्टिंग बनाता है। लेकिन Meesho के बिजनेस मॉडल की सबसे बड़ी ताकत ही कभी-कभी उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन सकती है। वो है लो प्राइसेस और बहुत सारे सेलर्स। जब प्लेटफार्म पर बहुत सारे सेलर्स आते हैं तो हर सेलर का प्रोडक्ट क्वालिटी के मामले में एक जैसा होना जरूरी नहीं है। कभी-कभी कस्टमर ऐप पर एक सुंदर कुर्ती की फोटो देखता है। फोटो में प्रोडक्ट बहुत अच्छा लगता है। लेकिन जब पार्सल घर पहुंचता है तो प्रोडक्ट की क्वालिटी एक्सपेक्टेशन के हिसाब से नहीं होती। कपड़ा पतला हो सकता है, फिटिंग अलग हो सकती है या प्रोडक्ट फोटो से काफी डिफरेंट हो सकता है। ऐसे में कस्टमर रिटर्न कर सकता है और रिटर्न्स सेलर के लिए एक बड़ी प्रॉब्लम बन सकते हैं। कुछ सिचुएशंस में सेलर को फॉरवर्ड शिपिंग और रिटर्नशिपिंग दोनों से जुड़े खर्चे उठाने पड़ सकते हैं। इसके अलावा प्रोडक्ट की पैकिंग और एडवरटाइजिंग पर भी पैसा खर्च होता है। अब सोचो अगर सेलर ने प्रोडक्ट पर पहले ही बहुत कम मार्जिन रखा है और उसके बाद रिटर्न आ जाता है तो उसका प्रॉफिट खत्म हो सकता है। इसी वजह से जीरो कमीशन होने के बावजूद हर सेलर के लिए Meesho पर प्रॉफिट कमाना आसान नहीं है। एक और इंपॉर्टेंट बात कंपनी का रेवेन्यू बढ़ना और कंपनी का प्रॉफिट में होना दोनों अलग चीजें हैं। और Meesho के फाइनेंसियल रिजल्ट्स इसी बात को समझने का मौका देते हैं। फाइनेंसियल ईयर 2026 में Meesho ने लगभग ₹1,626 करोड़ का रेवेन्यू रिपोर्ट किया। यह पिछले फाइनेंसियल ईयर के मुकाबले लगभग 34% ज्यादा था। लेकिन कंपनी का नेट लॉस लगभग ₹1,358 करोड़ रहा। अब इस बात को समझना जरूरी है। एक कंपनी का रेवेन्यू बढ़ सकता है लेकिन फिर भी उसका नेट लॉस हो सकता है। क्योंकि रेवेन्यू कंपनी की टोटल कमाई को दिखाता है। जबकि नेट प्रॉफिट या नेट लॉस निकालने के लिए कंपनी के सारे रेलेवेंट एक्सपेंसेस और दूसरे फाइनेंसियल आइटम्स को भी अकाउंट में लेना पड़ता है। इसलिए सिर्फ रेवेन्यू देखकर यह डिसाइड नहीं किया जा सकता कि बिजनेस कितना प्रॉफिटेबल है। Meesho का लॉस पिछले फाइनेंसियल ईयर के लगभग ₹3,942 करोड़ से कम हुआ। लेकिन कंपनी अभी भी लॉस में थी। यानी ग्रोथ के साथ-साथ प्रॉफिटेबिलिटी भी एक इंपॉर्टेंट चैलेंज है। और आगे चलकर Meesho अपने बिजनेस को कितना प्रॉफिटेबल बना पाती है, यह देखना काफी इंटरेस्टिंग होगा। तो दोस्तों, Meesho की कहानी से हमें बिजनेस का एक इंपॉर्टेंट लेसन मिलता है। हर बिजनेस को पैसा कमाने के लिए एक ही तरीके का यूज करना जरूरी नहीं है। Amazon और Flipkart जैसे प्लेटफॉर्म्स पर सेलर कमीशन एक इंपॉर्टेंट रेवेन्यू सोर्स हो सकता है। वहीं Meesho ने जीरो कमीशन को अपनी स्ट्रेटजी का एक इंपॉर्टेंट हिस्सा बनाया। इससे सेलर्स को अट्रैक्ट करने और कस्टमर्स को लो प्राइसेस ऑफर करने में मदद मिल सकती है। और कंपनी लॉजिस्टिक्स और एडवरटाइजिंग जैसे दूसरे सोर्सेस से रेवेन्यू जनरेट कर सकती है। लेकिन यहां एक बात याद रखना जीरो कमीशन का मतलब जीरो कॉस्ट नहीं होता। सेलर के लिए शिपिंग, रिटर्न्स, एडवरटाइजिंग और प्रोडक्ट क्वालिटी जैसे फैक्टर्स अब भी इंपॉर्टेंट हैं। और कंपनी के लिए रेवेन्यू ग्रोथ के साथ प्रॉफिटेबल बनना भी जरूरी है। बिजनेस की दुनिया में एक सिंपल रूल है। जब कोई सर्विस फ्री दिखाई देती है, तो यह समझना जरूरी है कि उस बिजनेस को चलाने के लिए पैसा कहां से आ रहा है। अब आप बताओ, क्या Meesho लॉन्ग टर्म में Amazon और Flipkart को टक्कर दे पाएगा? या फिर जीरो कमीशन मॉडल को प्रॉफिटेबल बनाना उसके लिए सबसे बड़ी चैलेंज रहेगी। अपनी राय कमेंट्स में जरूर बताओ।
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Assuntos: E-commerce, Plataformas e marketplaces, Marketing e SEO, Logística e pagamentos. Publicado no YouTube em 2026-11-06.
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